बार काउंसिल ऑफ इंडिया के भीतर अब उसके चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के खिलाफ असंतोष खुलकर सामने आ गया है। सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर बीसीआई के प्रमुख के तौर पर उनके बने रहने पर सवाल उठाए गए हैं। बीसीआई जनरल काउंसिल मीटिंग में मिश्रा के इस्तीफे की मांग औपचारिक रूप से उठाई गई।
केरल से बीसीआई सदस्य मनोज कुमार नरेंद्रन ने बैठक के दौरान सीधे मिश्रा के इस्तीफे की मांग की। उनकी मांग को उत्तर प्रदेश से एक अन्य सदस्य, एडवोकेट श्रीनाथ त्रिपाठी का समर्थन मिला।
मिश्रा को संबोधित एक बाद के पत्र में नरेंद्रन ने वैधानिक निकाय की वर्तमान कार्यप्रणाली पर गहरी पीड़ा व्यक्त की है, विशेष रूप से अध्यक्ष के नेतृत्व में, जो 14 वर्षों से अधिक समय तक बीसीआई के अध्यक्ष रहे हैं। नरेंद्रन ने कहा है कि किसी एक व्यक्ति द्वारा इतने लंबे समय तक नेतृत्व करना वैधानिक संस्था के लिए “अस्वस्थ” है जो लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, सामूहिक जिम्मेदारी और संस्थागत निर्णय लेने पर आधारित है।
अपने पत्र में नरेंद्रन ने कहा: “इन परिस्थितियों में मैं यह कहने के लिए बाध्य हूं कि जिस तरह से बीसीआई आपके नेतृत्व में काम कर रहा है, उसके परिणामस्वरूप कानूनी पेशे के सदस्यों के बीच विश्वास में गंभीर कमी आई है। मेरे विचार में अध्यक्ष के रूप में आपका बने रहना, बीसीआई के लोकतांत्रिक, स्वतंत्र, पारदर्शी और वैधानिक कामकाज में विश्वास बहाल करने की तत्काल आवश्यकता के साथ असंगत हो गया।”
नरेंद्रन ने बीसीआई की वर्तमान कार्यप्रणाली के साथ कई मुद्दे उठाए, और विशेष रूप से उस संशोधन की वैधता पर चिंता जताई है जिसके द्वारा अध्यक्ष का कार्यकाल पांच साल तक बढ़ा दिया गया।
उधर, एडवोकेट योगमाया एमजी द्वारा दायर इस रिट याचिका में मिश्रा के कार्यकाल और इस पद पर उनके लंबे समय तक बने रहने को चुनौती दी गई। याचिका में कहा गया कि मिश्रा पहली बार 2012 में बीसीआई चेयरमैन बने थे। 2014 में थोड़े समय के ब्रेक के बाद वह नवंबर 2014 में इस पद पर लौटे और तब से चेयरमैन बने हुए हैं। मार्च 2025 में उन्हें फिर से निर्विरोध चुना गया। याचिकाकर्ता इसे उनका लगातार सातवां कार्यकाल बता रहे हैं।
इस बीच, बीसीआई के सह-अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता वाईआर सदाशिव रेड्डी ने भी मिश्रा से चेयरमैन पद से इस्तीफा देने की मांग की है। रेड्डी ने कहा है कि “द बार डिजर्व्स बेटर” यानी वकीलों को इससे बेहतर नेतृत्व मिलना चाहिए। बता दें कि मिश्रा बीजेपी के राज्यसभा सांसद भी हैं। उन पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आरोप लगा चुकी है कि वो बार काउंसिल ऑफ को मोदी सरकार के इशारे पर चला रहे हैं।
रेड्डी ने कई गंभीर आरोप और मुद्दे गिनाए हैं। इनमें नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के छात्रों के खिलाफ बीसीआई की कार्रवाई, करीब 150 करोड़ रुपये की धनराशि के कथित डायवर्जन, परिवार के सदस्यों की नियुक्तियों से जुड़े आरोप और बीसीआई के कामकाज को लेकर उठे सवाल शामिल हैं।
लाइव लॉ के मुताबिक बार के सह अध्यक्ष रेड्डी ने इस संबंध में पत्र लिखा है। उन्होंने कहा कि चुप रहना “इस देश के वकीलों द्वारा मुझ पर जताए गए भरोसे के साथ विश्वासघात” के समान होगा। रेड्डी ने कहा कि बीसीआई किसी व्यक्ति की “निजी संपत्ति” नहीं है, बल्कि यह अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत स्थापित एक वैधानिक संस्था है। उन्होंने कहा कि बीसीआई के पास देश के लाखों वकीलों के योगदान से जुटाई गई धनराशि है और यह कानूनी पेशे में प्रवेश को नियंत्रित करने वाली नियामक शक्तियों का इस्तेमाल करती है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि बीसीआई की धनराशि और उसकी शक्तियों का इस्तेमाल संस्था और पूरे वकालत समुदाय के हित में होना चाहिए, न कि उस व्यक्ति के लिए जो चेयरमैन के पद पर बैठा है।
रेड्डी ने मांग की है कि मिश्रा पत्र मिलने के 15 दिनों के भीतर अपने पद से इस्तीफा दें। उन्होंने बीसीआई की एक विशेष बैठक बुलाकर पत्र में उठाए गए मुद्दों पर विचार करने की मांग भी की है। इसके साथ ही उन्होंने बीसीआई और बीसीआई ट्रस्ट पर्ल फर्स्ट के खातों का विशेष ऑडिट कराने की भी मांग की है।
उन्होंने आगे मांग की कि बीसीआई या उससे जुड़ा कोई भी ट्रस्ट अथवा संस्था कानून कॉलेजों, विश्वविद्यालयों या उनके प्रबंधन से किसी भी तरह का योगदान, दान या भुगतान तत्काल स्वीकार करना बंद करे। उन्होंने बीसीआई की वेबसाइट पर संस्था के कर्मचारियों की पूरी जानकारी प्रकाशित करने की भी मांग की। रेड्डी ने कहा, “मेरे मन में आपके प्रति कोई व्यक्तिगत दुर्भावना नहीं है।” उन्होंने बताया कि वह करीब एक दशक से मनन मिश्रा के साथ काउंसिल में काम कर चुके हैं।
याचिका का एक बड़ा हिस्सा बीसीआई ट्रस्ट पर्ल फर्स्ट [बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ट्रस्ट फ़ॉर प्रमोशन ऑफ़ एजुकेशन (लीगल एंड प्रोफ़ेशनल) एंड रिफ़ॉर्म्स इन लॉ एंड फ़ॉर इम्प्रूवमेंट ऑफ़ रिसर्च एंड सोशल ट्रेनिंग] से संबंधित है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से एक स्वतंत्र समिति गठित करने का आग्रह किया है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज या हाईकोर्ट के पूर्व चीफ़ जस्टिस करें।
याचिकाकर्ता ने गोवा में बीसीआई द्वारा चलाए जा रहे लॉ कॉलेज – इंडिया इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ लीगल एजुकेशन एंड रिसर्च पर भी सवाल उठाए। वह चाहती हैं कि एक स्वतंत्र समिति अप्रैल 2012 के बाद से हुई नियुक्तियों, भर्ती, प्रमोशन और प्रशासनिक कार्यों की जांच करे, जहां भी प्रथम दृष्टया जांच की आवश्यकता हो। याचिका में खास तौर पर गोवा में चलाए जा रहे कॉलेज, ट्रस्ट और संबंधित संस्थानों में नियुक्तियों से जुड़े आरोपों का ज़िक्र किया गया। इसमें विज्ञापन, आवेदन, चयन समिति की कार्यवाही, मूल्यांकन शीट, नियुक्ति आदेश, सेवा रिकॉर्ड, संबंधों का खुलासा और वित्तीय मंज़ूरी जैसे रिकॉर्ड की मांग की गई।
मिश्रा नालसार यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों द्वारा दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को बुलाये जाने का विरोध करने पर एनरोलमेंट पर प्रतिबंध की कार्रवाई के कारण विवादों में आये हैं। यह कार्रवाई उन्हें सोशल मीडिया में हंगामा होने पर चंद घंटों में वापस लेनी पड़ी। मुख्य न्यायाधीश ने भी बीसीआई को फटकार लगायी थी।
मिश्रा हालांकि इस्तीफ़ा देने से यह कहकर मना कर चुके हैं कि वह चुनकर पद पर आये हैं।
(जनचौक ब्यूरो)